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Acharya Shri Umaswati
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औपशमिक-क्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य
स्वतत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ च ॥१॥

सूत्रार्थ – औपशमिक, क्षायिक, मिश्र, औदायिक और पारिणामिक – ये जीव के स्वतत्त्व हैं॥१॥

भावार्थ

अर्थ: औपशमिक, क्षायिक, मिश्र, औदयिक व पारिणामिक ये जीव के पाँच भाव हैं। जैसे मैले पानी में निर्मली मिला देने से मैल नीचे बैठ जाता है और जल कुछ स्वच्छ हो जाता है। वैसे ही कारण के मिलने पर प्रतिपक्षी कर्म की शक्ति के दब जाने से आत्मा में निर्मलता का होना औपशमिक भाव है। ऊपर वाले दृष्टान्त में उस स्वच्छ जल को, जिसके नीचे मैल बैठ गया है, किसी साफ बर्तन में निकाल लेने पर उसके नीचे का मैल दूर हो जाता है और केवल निर्मल जल रह जाता है। वैसे ही प्रतिपक्षी कर्म का बिल्कुल अभाव होने से आत्मा में जो निर्मलता होती है वह क्षायिक भाव है। जैसे, उस पानी को दूसरे बर्तन में निकालते समय कुछ मैल यदि साथ में चला आए और आकर जल के नीचे बैठ जाए तो उस समय उसकी स्थिति वैसी ही रहती है। वैसे ही प्रतिपक्षी कर्म के सर्वघाती स्पर्द्धकों का उपशाम होने और आगे उदय होने वाले निषेकों का सत्ता में उपशम होने से तथा देशघाती स्पर्द्धकों का उदय होते हुए जो भाव होता है उसे क्षायोपशमिक भाव कहते हैं। उसी का नाम मिश्र भाव है। द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के निमित्त से कर्म का फल देना उदय है और उदय से जो भाव होता है उसे औदयिक भाव कहते हैं। और जो भाव कर्म की अपेक्षा के बिना स्वभाव से होते हैं वह पारिणामिक भाव है। इस तरह ये जीव के पाँच भाव होते हैं ॥१॥
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The distinctive characteristics (svatattva) of the soul (jīva) are the dispositions or thought-activities – bhāva – arising from subsidence – upaśama, destruction – kÈaya, destruction-cum-subsidence – kÈayopaśama – of karmas, the fruition – udaya – of karmas, and its inherent nature or capacity – pariõāma.
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: जीव गुण पाँच हैं, उनमें उपाधि का चतुर्विधपना जिनका कारण है ऐसे चार है, तथा स्वभाव जिसका कारण है ऐसा एक है। उपाधि के भेद से एवं स्वभाव के भेद से भेद करने पर उन्हें अनेक प्रकारों से विस्तृत किया जाता है। उदय से, उपशम से, क्षय से, क्षयोपशम से और परिणाम से युक्त ऐसे जीव गुण हैं। जीव के पाँच भाव हैं-
(१) औपशमिक (२) क्षायिक (३) क्षायोपशमिक (४) औदयिक (५) पारिणामिक। जीव के औपशमिकादि पाँचों भाव होते हैं एवं इन पाँच भावों के परस्पर संयोग से उत्पन्न हुआ सान्निपातिक नाम का एक छठा भाव भी आचार्यों ने माना है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: कर्मों की अत्यन्त निवृत्ति को क्षय कहते हैं। जैसे—जिस जल का मैल नीचे बैठा हो, उसे यदि दूसरे पवित्र पात्र में रख दिया जाए तो उसमें अत्यन्त निर्मलता आ जाती है, उसी प्रकार आत्मा से कर्मों की अत्यन्त निवृत्ति होने से जो आत्यन्तिक विशुद्धि होती है, वह क्षय कहलाती है तथा कर्मों का क्षय जिसमें प्रयोजनभूत है वह क्षायिक भाव है। कर्मों का क्षय होने पर उत्पन्न होने वाला भाव क्षायिक भाव है तथा कर्मों के क्षय के लिए उत्पन्न हुआ क्षायिक भाव है, ऐसी दो प्रकार की शब्द व्युत्पत्ति ग्रहण करना चाहिए।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 27 Jan 2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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