
Acharya Shri Umaswati
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क्षेत्र-काल-गति-लिंग-तीर्थ-चारित्र-प्रत्येकबुद्ध-बोधित-ज्ञानावगाहनान्तर-संख्याल्पबहुत्वत: साध्याः ॥९॥
सूत्रार्थ– क्षेत्र, काल, गति, लिंग, तीर्थ, चारित्र, प्रत्येकबुद्ध, बोधितबुद्ध, ज्ञान, अवगाहना, अन्तर, संख्या और अल्पबहुत्व- इन द्वारा सिद्ध जीव जाने जाते हैं ॥९॥


भावार्थ
अर्थ: क्षेत्र, काल, गति, लिंग, तीर्थ, चारित्र, प्रत्येक बुद्ध, बोधित, ज्ञान, अवगाहना, अन्तर, संख्या और अल्पबहुत्व, इन बारह अनुयोगों के द्वारा सिद्धों में भेद का विचार करना चाहिए। ॥९॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf
English Meaning:
The liberated souls can be differentiated with reference to the region – ksetra, time – kāla, state – gati, sign – lińga, the Tīrthańkara – tīrtha, conduct – cāritra, self- enlightened – pratyekabuddha, enlightened by others – bodhitabuddha, knowledge – jñāna, stature – avagāhanā, interval – antara, number – samkhyā, and numerical comparison – alpabahutva.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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मुक्त जीवों में कंचित् भेद
| अनुयोग | प्रत्युत्पन्न नय (वर्तमान की अपेक्षा करने वाला) | भूत नय (अतीत काल को ग्रहण करने वाला) |
|---|---|---|
| 1. क्षेत्र | * अपने आत्मप्रदेश * आकाशप्रदेश * सिद्ध क्षेत्र | * जन्म अपेक्षा- 15 कर्म भूमि * अपहरण अपेक्षा- अढ़ाई द्वीप |
| 2. काल | 1 समय में | * विदेह में- सर्व काल * भरत- ऐरावत में – अवसर्पिणी के चौथे काल में – उत्सर्पिणी के तीसरे काल में उत्पन्न जीव ही सिद्ध होते हैं। हुण्डावसर्पिणी काल चौथे की जगह से तीसरे काल में उत्पन्न जीव भी सिद्ध होते हैं। |
| 3. गति | सिद्ध गति | * निरंतर- मनुष्य गति * एकांतर- चारों में आवर |
| 4. लिंग (वेद) -भाव | वेदरहित | * तीनों वेद |
| – द्रव्य | – | * पुरुष वेद * यथाजात रूप निर्विकल्पता * नग्नता |
| 5. तीर्थ | – | * तीर्थंकर बनकर * इतर – तीर्थंकर के रहते – तीर्थंकर के अभाव में |
| 6. चारित्र | चारित्र– अचारित्र के अभाव में | * निकट– यथाख्यात चारित्र * दूर- 5 चारित्र अथवा परिहार विशुद्धि के अलावा शेष चार चारित्र |
| 7. प्रत्येकबुद्ध/ बोधितबुद्ध | – | * प्रत्येक बुद्ध– स्वयं से ज्ञान प्राप्त करे * बोधित बुद्ध– दूसरे के उपदेश से ज्ञान प्राप्त करे |
| 8, ज्ञान | केवलज्ञान | * 2 ज्ञान * 3 ज्ञान * 4 ज्ञान |
| 9. अवगाहना | अंतिम शरीर से कुछ कम | * उत्कृष्ट– 525 धनुष * मध्यम– अनेक भेद * जघन्य– 3 1/2 हाथ |
अल्पबहुत्व (सिद्ध होने वाले जीवों की संख्या की तुलना) – कम से अधिक
| विषय | तुलना |
|---|---|
| 1. क्षेत्र | लवणसमुद्र < कालोदधि समुद्र < जम्बूद्वीप धातकी खण्ड द्वीप < पुष्करार्द्ध द्वीप |
| 2. काल | उत्सर्पिणी < अवसर्पिणी < दोनों में सिद्धि (विदेह क्षेत्र में परिवर्तन नहीं) |
| 3. गति (भूत अपेक्षा) किस गति से आकर | तिर्यंच गति < मनुष्य गति < नरक गति < देव गति |
| 4. लिंग (भूत अपेक्षा) | भाव नपुंसक वेद < भाव स्त्रीवेद < भाव पुरुषवेद |
| 5. तीर्थ | तीर्थंकर केवली < सामान्य केवली |
| 6. चारित्र (भूत अपेक्षा) | 5 चारित्र वाले < 4 चारित्र वाले |
| 7. प्रत्येक– बोधितबुद्ध | प्रत्येक बुद्ध < बोधित बुद्ध |
| 8. ज्ञान (भूत अपेक्षा) | 2 ज्ञानधारी < 4 ज्ञानधारी < 3 ज्ञानधारी |
| 9, अवगाहना | जघन्य अवगाहना < उत्कृष्ट अवगाहना < मध्यम अवगाहना |
| 10. अंतर | 6 माह के अंतर से < 1 समय के अंतर से < मध्य के अंतर से |
| 11. संख्या (1 समय में सिद्ध) | 108 जीव < 107-50 जीव < 49–25 जीव < 24–1 जीव |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: सिद्ध क्षेत्र में वा कर्मभूमि में सिद्ध होते हैं। प्रत्युत्पन्न नय की अपेक्षा सिद्धक्षेत्र, स्वप्रदेश या आकाशप्रदेश में सिद्धि होती है। भूतप्रज्ञापन नय की अपेक्षा पन्द्रह कर्मभूमियों में और संहरण की अपेक्षा मनुष्य लोक में सिद्धि होती है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
उत्तर : सिद्ध गति में मनुष्यगति से सिद्धि होती है। प्रत्युत्पन्न नय की दृष्टि से सिद्ध गति में सिद्धि होती है। भूतनय की अपेक्षा दो विकल्प हैं। (१) एकान्तर गति (२) अनन्तर गति। एकान्तरगति की अपेक्षा चारों गतियों में सिद्धि होती है, अनन्तरगति भूतनय की अपेक्षा मनुष्य गति में ही सिद्धि होती है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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Diksha Jain created this page on 11-Mar-2026
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