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Acharya Shri Umaswati
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Mangalacharan/मंगलाचरण

मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्।
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्क्षये॥


भावार्थ – जो मोक्षमार्ग के नेता हैं, कर्मरुपी पर्वतों के भेदनेवाले हैं और विश्वतत्त्व के ज्ञाता हैं, उनकी मैं ऊन समान गुणों की प्राप्ती केलिए द्रव्य और भाव उभयरूप से वन्दना करता हूँ।

English Meaning- This is a Mangalacharan (auspicious invocation/blessing).
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    A["<b>(मोक्षमार्गस्य नेतारम्)</b><br>मोक्षमार्ग के नेता"] --> B["<b>भेत्तारं<br>कर्मभूभृताम्</b><br>कर्मरूपी पर्वतों के<br>भेदनेवाले"] & C["<b>ज्ञातारं<br>विश्वतत्त्वानाम्</b><br>सम्पूर्ण तत्वों को<br>जानने वाले"] & F["<b>(मोक्षमार्गस्य नेतारम्)</b><br>मोक्षमार्ग के नेता<br><b>हितोपदेशी</b>"]
    B --> D["<b>वीतरागी</b>"]
    C --> E["<b>सर्वज्ञ</b>"]
    D --> G["<b>को नमस्कार किया</b><br>उनके जैसे गुणों की<br>प्राप्ति के लिए"]
    E --> G
    F --> G

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान
उत्तर : पुण्य, पूत, पवित्र,प्रशस्त, शिव, भद्र, क्षेम, कल्याण, शुभ और सौख्य इत्यादिक सब मंगल के ही पर्यायवाची शब्द हैं। यह द्रव्यमल और भावमल को गलाता है, विनष्ट करता है, घातता है, दहन करता है, हनता है, शुद्ध करता है और विध्वंश करता है, इसलिए इसे मंगल कहा गया है। ‘मंग’ शब्द सुखवाची और पुण्य रूप पदार्थ का प्रतीपादक है, उस सुख अथवा पुण्य को लाता है वह मंगल है। इसी मंगल के द्वारा ग्रंथकर्ता अपने कार्य की सिद्धि पर पहुँचा जाता है। पूर्व में आचार्यों द्वारा मंगल पूर्वक ही शास्त्र का पठन-पाठन हुआ है। इसी को निश्चय से लाता है अर्थात ग्रहण करता है, इसलिए यह मंगल श्रेष्ठ हैं। जिवों के पाप को उपचार से मल कहा जाता है। उसे यह मंगल है, विनाश को प्राप्त करता है, इस कारण भी कोई आचार्य ईसे मंगल कहते है। इस मंगल रूप आचरण को मंगलाचरण कहते है।

उत्तर : पूर्वकालीन आचार्यों ने जो शास्त्रों में मंगल कहा है वह मंगल नियम से तीन स्थानों पर करना चाहिए- १- शास्त्र की आदि में, २- शास्त्र के मध्य में और ३- शास्त्र के अन्त में।



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 12-Dec-2025.

Courtesy:
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