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Tattvartha Sutra – Chapter 1-Sutra 25

Acharya Shri UmaswamiRead About Acharya Umaswamihere – विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययो:।।२५।।सूत्रार्थ – विशुद्धि, क्षेत्र, स्वामी और विषय की अपेक्षा अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान में भेद है।।२५।। भावार्थ अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान में विशुद्धि, क्षेत्र…

Tattvartha Sutra – Chapter 1-Sutra 24

Acharya Shri UmaswamiRead About Acharya Umaswamihere – विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां तव्दिशेष:।।२४।।सूत्रार्थ – विशुद्धि और अप्रतिपात की अपेक्षा इन दोनों में अन्तर है।।२४।। भावार्थ ऋजुमति और विपुलमति में विशुद्धि और अप्रतिपात की अपेक्षा…

Tattvartha Sutra – Chapter 1-Sutra 23

Acharya Shri UmaswamiRead About Acharya Umaswamihere – ऋजुविपुलमती    मनःपर्ययः।।२३।।सूत्रार्थ – ऋजुमती और विपुलमती मनःपर्ययःज्ञान है।।२३।। भावार्थ मनःपर्यय ज्ञान के दो भेद हैं—ऋजुमति और विपुलमति। दूसरे के मन में सरल रूप…

Tattvartha Sutra – Chapter 1-Sutra 22

Acharya Shri UmaswamiRead About Acharya Umaswamihere – क्षयोपशमनिमित्तः षड्विकल्पः शेषाणाम्।।२२।।सूत्रार्थ – क्षयोपशम निमित्तक अवधिज्ञान छह प्रकार का है, जो शेष अर्थात् तिर्यंचों और मनुष्यों के होता है।।२२।। भावार्थ क्षयोपशम निमित्त…

Tattvartha Sutra – Chapter 1-Sutra 21

Acharya Shri UmaswamiRead About Acharya Umaswamihere – भावप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्।।२१।।सूत्रार्थ – भावप्रत्यय अवधिज्ञान देव और नारकीयों के होता है।।२१।। भावार्थ अनिन्द्रिय अर्थात मन और श्रुत अर्थात श्रुत ज्ञान का विषयभूत पदार्थ। श्रुतज्ञान…

Tattvartha Sutra – Chapter 1-Sutra 20

Acharya Shri UmaswamiRead About Acharya Umaswamihere – श्रुतं मतिपूर्वं व्दयनेकव्दादशभेदम।।२०।।सूत्रार्थ – श्रुतज्ञान मतिज्ञान पूर्वक होता है। वह दो प्रकार का, अनेक प्रकार का और बारह प्रकार का है।।२०।। भावार्थ श्रुतज्ञान…

Tattvartha Sutra – Chapter 1-Sutra 19

Acharya Shri UmaswamiRead About Acharya Umaswamihere – न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम्।।१९।।सूत्रार्थ – चक्षु और मन से व्यंजनावग्रह नहीं होता।।१९।। भावार्थ लब्धि और उपयोग को भावेन्द्रिय कहते हैं। ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम विशेष…

Tattvartha Sutra – Chapter 1-Sutra 18

Acharya Shri UmaswamiRead About Acharya Umaswamihere – व्यञ्जनस्यावग्रह:।।१८।।सूत्रार्थ – व्यंजन का अवग्रह ही होता है।।१८।। भावार्थ व्यंजन अर्थात् अस्पष्ट शब्द वगैरह का केवल अवग्रह ही होता है, ईहा आदि नही…

Tattvartha Sutra – Chapter 1-Sutra 17

Acharya Shri UmaswamiRead About Acharya Umaswamihere – अर्थस्य।।१७।।सूत्रार्थ – अर्थ (वस्तु के) अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा – ये चारों मतिज्ञान होते हैं।।१७।। भावार्थ ये बहु, बहुविध आदि पदार्थ के…

Tattvartha Sutra – Chapter 1-Sutra 16

Acharya Shri UmaswamiRead About Acharya Umaswamihere – बहुबहुविधक्षिप्रानि:सृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम्।।१६।।सूत्रार्थ – सेतर (प्रतिपक्षसहित) बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनि:सृत, अनुक्त और ध्रुव के अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा रूप मतिज्ञान होते हैं।।१६।। भावार्थ…