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Tattvartha Sutra – Chapter 2 – Sutra 49

Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – शुभं विशुद्धमव्याघाती चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ।।४९।।सूत्रार्थ– आहारक शरीर शुभ, विशुद्ध और व्याघात रहित है और वह प्रमत्तसंयत के ही होता है ।।४९।। भावार्थ अर्थ:…

Tattvartha Sutra – Chapter 2 – Sutra 48

Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – तैजसमपि ।।४८।।सूत्रार्थ– तैजसशरीर भी लब्धिप्रत्यय (ऋद्धीनिमित्तक) होता है ।।४८।। भावार्थ अर्थ– वैक्रियिक शरीर भी लब्धि प्रत्यय होता है।Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष–Link to book…

Tattvartha Sutra – Chapter 2 – Sutra 47

Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – लब्धिप्रत्ययं च ।।४७।।सूत्रार्थ– तथा लब्धि से भी पैदा होता है ।।४७।। भावार्थ अर्थ– लब्धि से भी वैक्रियिक शरीर होता है। विशेष तपस्या करने…

Tattvartha Sutra – Chapter 3 – Sutra 28

Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥२८॥सूत्रार्थ– भरत ऐरावतक्षेत्र के सिवाय अन्य भूमियों में (उत्सर्पिणी अवसर्पिणी) परिवर्तन नहीं होता है। वे सदा एक सी रहती हैं ॥२८॥…

Tattvartha Sutra – Chapter 3 – Sutra 27

Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ।।२७ ।।सूत्रार्थ– भरत ऐरावत क्षेत्र में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के छह-छह कालों में मनुष्यों की आयु की वृद्धि और ह्रास होता…

Tattvartha Sutra – Chapter 2 – Sutra 46

Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – औपपादिकं वैक्रियिकम् ।।४६।।सूत्रार्थ– वैक्रियिक शरीर उपपाद जन्म से पैदा होता है ।।४६।। भावार्थ अर्थ– उपपाद जन्म से जो शरीर उत्पन्न होता है वह…

Tattvartha Sutra – Chapter 3 – Sutra 26

Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥२६॥सूत्रार्थ– विदेह क्षेत्र से उत्तर के तीन पर्वत और तीन क्षेत्र, दक्षिण के पर्वत और क्षेत्रों के समान विस्तार वाले हैं…

Tattvartha Sutra – Chapter 3 – Sutra 25

Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – द्विगुण-द्विगुणा विस्तारा वर्षधर- वर्षा विदेहान्ताः ॥ २५॥सूत्रार्थ– (विदेहान्ता) विदेहक्षेत्र पर्यन्त के (वर्षधरवर्षा) पर्वत और क्षेत्र (तद्विगुणद्विगुणाः) भरतक्षेत्र से दूने दूने विस्तार वाले (सन्ति)…

Tattvartha Sutra – Chapter 2 – Sutra 45

Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – गर्भसम्मूर्छनजमाद्यम् ।।४५।।सूत्रार्थ– पहला शरीर गर्भ और सम्मूर्छन जन्म से पैदा होता है ।।४५।। भावार्थ अर्थ– गर्भ जन्म तथा सम्मूर्छन जन्म से जो शरीर…

Tattvartha Sutra – Chapter 2 – Sutra 44

Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – निरुपभोगमन्त्यम ।।४४।।सूत्रार्थ– अन्तिम शरीर उपयोग रहित है ।।४४।। -इन्द्रियों के द्वारा शब्द वगैरह के ग्रहण करने को उपयोग कहते हैं। -कार्मण शरीर में…