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Acharya Shri Umaswati
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प्राग्ग्रैवेयकेभ्या कल्पाः ॥२३॥
सूत्रार्थ– ग्रैवेयकों से पहले तक कल्प हैं ॥२३॥




भावार्थ

अर्थ: सौधर्म से लेकर ग्रैवेयक से पहले अर्थात् सोलहवें स्वर्ग तक कल्प संज्ञा हैं; क्योंकि जिनमें इन्द्र वगैरह की कल्पना पाई जाती है उन्हें ही कल्प संज्ञा है। अतः नौ ग्रैवेयक, नौ अनुदिश और पाँच अनुत्तर कल्पातीत हैं; क्योंकि अहमनिन्द्र होने से उनमें इन्द्र आदि की कल्पना नहीं होती ॥२३॥
Reference: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Prior to the graiveyaka are the kalpa.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: यह नहीं मालूम होता कि यहाँ से लेकर कल्प हैं, इसलिए सौधर्म आदि पद की अनुवृत्ती होती है। इससे यह अर्थ प्राप्त होता है कि सौधर्म से लेकर और नौ ग्रैवेयक से पूर्व तक कल्प हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: परिशेष न्याय से कल्पातीत की सिद्धि हो जाती है। सौधर्म स्वर्ग से लेकर नव ग्रैवेयक से पहले कल्पोपपन्न हैं – ऐसा कहने पर परिशेष न्याय से नव ग्रैवेयक से लेकर अनुत्तर विमानों के अन्त तक कल्पातीत हैं – यह सिद्ध हो जाता है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 22 February 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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