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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
तद्भावाव्ययं नित्यम् ॥३१॥
Meaning
(तद्भावाव्ययम्) तद्भावरूप से जो अव्यय है, नष्ट नहीं होता वह
(नित्यम्) नित्य (कथ्यते) कहलाता है॥३१॥

भावार्थ

नित्य का तात्पर्य यह नहीं है कि जो वस्तु जिस रूप में है वह सदा उसी रूप में बनी रहे और उसमें कुछ भी परिणमन न हो । किन्तु परिणमन के होते हुये भी उसमें ऐसी एकरूपता का बना रहना ‘नित्यता है, जिसे देखकर हम तुरन्त पहिचान लें कि यह वही वस्तु है जिसे पहले देखा था । पदार्थ में यह नित्यता सामान्यस्वरूप की अपेक्षा ही होती है विशेष पर्याय की अपेक्षा सभी द्रव्ये अनित्य हैं। इसलिये संसार के सभी पदार्थ नित्यानित्य रूप हैं। Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष Link to book

English Meaning:

Permanence (nitya) is indestructibility of own-nature(tadbhāva). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


नित्य

flowchart TB

A["नित्य"]

A --> B["तद्भाव"]
A --> C["का"]
A --> D["अव्यय"]

B --> B1["जिस वस्तु का जो भाव है"]
C --> C1["उससे"]
D --> D1["च्युत न होना"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer नित्यावस्थितान्यरूपाणि’ यह सूत्र कह आये हैं। वहाँ यह नहीं ज्ञात होता है कि नित्य क्या है, इसलिए यह सूत्र कहा है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer तद्भाव प्रत्यभिज्ञान का हेतु है ‘यह वही है’ इस प्रकार का स्मरण प्रत्यभिज्ञान है । जिस स्वरूप में वस्तु को पहले देखा था उसी रूप में पुनः देखने पर ‘तदेवेदम्’ यह वही है ऐसा ज्ञान एकत्व प्रत्यभिज्ञान है। यह प्रत्यभिज्ञान निर्विषयक और निर्हेतुक नहीं होता है अतः इस प्रत्यभिज्ञान में जो कारण है वह तद्भाव है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 13-feb-2026

Courtesy:
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