
Acharya Shri Umaswati
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एकं द्वौ त्रिन्वाऽनाहारकः ।।३०।।
सूत्रार्थ– एक, दो या तीन समय तक जीव अनाहारक रहता है ।।३०।।
भावार्थ
अर्थ– विग्रह गति में जीव एक समय, दो समय अथवा तीन समय तक अनाहारक रहता है। औदारिक, वैक्रियक, आहारक, इन तीन शरीर और छः पर्याप्तियों के योग्य पुद्गलों के ग्रहण करने को आहार कहते हैं। और शरीर के योग्य पुद्गलों के ग्रहण न करने को अनाहार कहते हैं। जो एक मोड़ा लेकर उत्पन्न होता है वह एक समय तक अनाहारक रहता है। जो दो मोड़ा लेकर उत्पन्न होता है वह दो समय तक अनाहारक रहता है और जो तीन मोड़े लेकर उत्पन्न होता है वह तीन समय तक अनाहारक रहता है। अर्थात् मोड़े के समय अनाहारक रहता है किन्तु जब मोड़ा समाप्त करके अपने उत्पत्ति स्थान के लिए सीधा गमन करता है उस समय आहारक हो जाता है ।।३०।।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
English Meaning:
For one, two or three instants (samaya) the soul remains non-assimilative – anāhāraka.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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विग्रहगति
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flowchart TB
A["विग्रहगति<br>(जीव का एक शरीर छोड़<br>दूसरे शरीर के लिए गमन करना)"] --> B["अविग्रह<br>(मोड़े रहित)"] & C["विग्रहवती<br>(मोड़े सहित)"]
B --> B1["ऋजुगति / इषु गति<br>सीधी - बिना मोड़<br>समय: 1 समय<br>अनाहारक काल:<br>अनाहारक नहीं होता"]
C --> C1["पाणिमुक्ता<br>1 मोड़<br>समय: 2 समय<br>अनाहारक काल:<br>1 समय"] & C2["लांगलिका<br>2 मोड़<br>समय: 3 समय<br>अनाहारक काल:<br>2 समय"] & C3["गोमूत्रिका<br>3 मोड़<br>समय: 4 समय<br>अनाहारक काल:<br>3 समय"]
A --- D["औदारिकादि तीन शरीर तथा
छः पर्याप्तियों के योग्य
पुद्गलों के ग्रहण करने को
आहार कहते हैं।"]
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style C3 fill:#FFCDD2
style D fill:#FFE0B2अनुश्रेणी गति
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flowchart TB
A["अनुश्रेणी गति
(आकाश के प्रदेशों की पंक्ति<br>के अनुसार गमन)"] --> B["मुक्त जीव"] & C["संसारी जीव"]
B --> D["सिर्फ<br>ऋजुगति"]
C --> E["चारों प्रकार<br>की गति"]
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style D fill:#E1BEE7
style E fill:#FFCDD2Video Pravachans
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: पदार्थ प्रथम क्षण में उत्पन्न होकर दूसरे ही क्षण में नष्ट होता है। इस प्रकार पदार्थ के स्वरूप को मानने वाले बौद्ध मत में विग्रहगति नहीं हो सकती है क्योंकि कारण के अभाव में कार्य की उत्पत्ति का अभाव है, और कार्य-कारण सम्बन्ध क्षणिक पदार्थ से बन सकता है। दुसरी बात वस्तु को सर्वथा कूटस्थ मानने वाले मतो में भि उत्तर भव के लिए गती होना असंभव है क्योंकि पूर्व शरीर का त्याग और उत्तर शरीर का ग्रहण कथंचित् अनित्य पदार्थ में ही सम्भव है। इन दोनों में (क्षणिकवादी एवं नित्यवादी) का खण्डन करने के लिए आचार्य महाराज ने उत्तरभव की प्राप्ति के लिए होने वाली गति का कथन किया है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
उत्तर: औदारिक, वैक्रियिक और आहारक इन तीन शरीर एवं (आहार, शरीर, इन्द्रिय श्वासोच्छ्वास, भाषा और मन) इन छः पर्याप्तियों के योग्य पुद्गल वर्गणाओं को ग्रहण करने वाला आहारक कहलाता है। शरीर नाम कर्म के उदय से प्राप्त जीव शरीर, वचन तथा मन के योग्य वर्गणाओं को ग्रहण करता है वह आहारक है। औदारिकादि तीन शरीरों में से किसी एक शरीर के योग्य वर्गणाओं को तथा भाषा व मन वर्गणाओं को जो नियम से ग्रहण करता है वह आहारक है। इस प्रकार का आहार जिसके बिना पाया जाता है उसे अनाहारक कहते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
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- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 6 February 2026.
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
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