
Acharya Shri Umaswati
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Sutra
रत्न- शर्करा बालुका-पङ्गधूम तमो महातमः प्रभाभूमथो घनाम्बु- वाताकाश-प्रतिष्ठाः सप्ताऽधोऽधः ॥ १॥
Meaning
(रत्नप्रभा) रत्नप्रभा (शर्कराप्रभा) शर्कराप्रभा, (बालुकाप्रभा) बालुकाप्रभा, (पङ्कप्रभा ) पङ्कप्रभा, (धूमप्रभा) धूमप्रभा ( तमोप्रभा) तमः प्रभा और (महातम: प्रभाः) महातमः प्रभा (भूमयः) ये भूमियाँ (सप्त) सात हैं और वे क्रम से (अधोऽधः ) नीचे नीचे (घनाम्बुवाता – काशप्रतिष्ठा) घनोदधिवातवलय, घनवातवलय, तनुवातवलय, और आकाश के आधार (सन्ति) हैं।

भावार्थ
विशेषार्थ अधोलोक में रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, वालुकाप्रभा, पट्टप्रभा, धूमप्रभा, तमः प्रभा, और महातमः प्रभा ये सात प्रथिवियाँ हैं। ये क्रम से एक के नीचे एक हैं। इनमें क्रम से धम्मा, वंशा, मेघा, अंजना, अरिष्टा, मघवा और माघवी ये सात नरक हैं।
Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष–Link to book
English Meaning:
In the lower world (Adholoka), there are seven earth layers called Ratnaprabha, Sharkaraprabha, Valukaprabha, Pattaprabha, Dhumaprabha, Tamahprabha, and Mahatamahprabha. These are arranged one below the other in descending order. Within these layers, respectively, are the seven hells named Dhamma, Vansha, Megha, Anjana, Arishta, Maghava, and Maghavi.
Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष–Link to book
नरकों का वर्णन
| पृथ्वियों के सार्थक नाम | नर्कों के नाम | पृथ्वियों की मोटाई (योजन में) | बिल्लों की संख्या | पटल | उदधु क्षेत्र | उदधु काल |
|---|---|---|---|---|---|---|
| रत्न प्रभा | धम्मा | 1,80,000 | 30 लाख | 13 | 1 योजन | भिन्न मुहूर्त |
| शर्करा प्रभा | वंशा | 32,000 | 25 लाख | 11 | 3½ कोस | यथा |
| वालुका प्रभा | मेघा | 28,000 | 15 लाख | 9 | 3 कोस | योग्य |
| पंक प्रभा | अंजना | 24,000 | 10 लाख | 7 | 2½ कोस | अनन्तमुहूर्त |
| धूम प्रभा | अरिष्ट | 20,000 | 3 लाख | 5 | 2 कोस | — |
| तम प्रभा | मघवी | 16,000 | 1 लाख | 3 | 1½ कोस | — |
| महातम प्रभा | माघवी | 8,000 | 5 | 1 | 1 कोस | अनन्तमुहूर्त |
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flowchart TB
A["बिल<br/>(नारकियों के रहने का स्थान)"]
A --> B["रचना / आकार"]
A --> C["प्रकार"]
B --> B1["ढोल की पोल के समान"]
B --> B2["तलवार की भाँति"]
C --> C1["इन्द्रक<br/>(बीच का बिल)"]
C --> C2["प्रकीर्णक<br/>(अंतराल में बिखरे हुए)"]
C --> C3[" श्रेणी बद्ध 4 दिशा व 4 विदिशा में कतारबद्ध"]Questions and Answers: शङ्का -समाधान
Answer: जैसे यष्टि सहित देवदत्त को यष्टि कहते हैं उसी प्रकार चित्र, वज्र, वैदर्य, लोहिताक्ष, मसारगत्व, गोमेद, प्रवाल, ज्योतिरस, अज्ञ्जन, मूलक, अंक, स्फटिक, चन्दन, वर्तक, बकुल और शिलामय नामक सोलहप्रकार के रत्नों की प्रभा होने के कारण रत्नप्रभा नाम है। (रा. वा. ३) यह पृथ्वी बहुत प्रकार के रत्नों से भरी हुई शोभायमान होती है, इसीलिए निपुण पुरुषों ने इसका ‘रत्नप्रभा’ यह सार्थक नाम कहा है।
Reference:
Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Answer शर्करा रूप मोटी-मोटी रेत की प्रभा के समान प्रभा होने से शर्कराप्रभा द्वितीय पृथ्वी का नाम है। बालू की प्रभा के समान प्रभावाली बालुकाप्रभा, कीचड़ के समान प्रभावाली पंकप्रभा, धूम के समान प्रभावाली धूमप्रभा, अंधकार के समान प्रभावाली तमः प्रभा और महान्धकार के समान प्रभा से युक्त महातमः प्रभा है। अथवा इन्द्रगोप के समान इन पृथिवियों की अनादि पारिणामिक संज्ञा है, जैसे – ‘इन्द्रगोप’ वह किसी कीड़े की संज्ञा अनादि, स्वाभाविक या रूह है क्योंकि इसमें “इन्द्रं गोपयतीति है। इन्द्रगोपः ” इस व्युत्पत्ति की अपेक्षा नहीं है उसी प्रकार तमः प्रभा आदि संज्ञा भी अनादि पारिणामिकी (रूढ़) समझना चाहिए।
Reference:
Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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Diksha Jain created this page on – 30-01-26
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