
Acharya Shri Umaswati
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व्दिनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्र मम् ॥२॥
सूत्रार्थ: उक्त पाँच भावों के क्रम से दो, नौ, अठारह. इक्कीस और तीन भेद हैं ॥२॥

भावार्थ
अर्थ: औपशमिक भाव के दो भेद हैं। क्षायिक भाव के नौ भेद हैं। मिश्र भाव के अठारह भेद हैं। औदयिक भाव के इक्कीस भेद हैं और पारिणामिक भाव के तीन भेद हैं।
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
English Meaning:
These are of two, nine, eighteen, twenty-one and three kinds, respectively.
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
जीव के असाधारण भाव

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| नाम | औपशमिक | क्षायिक | मिश्र (क्षायोपशमिक) | औदयिक | पारिणामिक |
|---|---|---|---|---|---|
| भेद | २ | ९ | १८ | २१ | ३ |
| कर्म का | उपशम (दबना) | क्षय (अत्यंत वियोग) | क्षयोपशम (फल, दबना, वियोग एक साथ) | उदय (फल) | कर्म-निरपेक्ष |
| संबंधित कर्म | मोहनीय | ४ घातिया | ४ घातिया | ८ कर्म | – |
| उदाहरण | जल में मैल का नीचे बैठना | जल का पूर्ण शुद्ध होना | जल में कुछ मैल का अभाव तथा दबना एवं कुछ का प्रकट होना | गंदला जल | जल सामान्य |
| आत्मा में | श्रद्धा व चारित्र सम्बन्धी भाव-मल दबना | गुणों की अवस्था में शुद्धता का सर्वथा क्षय | गुणों का आंशिक विकास | विभाव रूप परिणमन | जीवत्व, भव्यत्व अ भव्यत्व होना |
| हेय-उपादेय व सिद्धि | एकदेश उपादेय | प्रकट करने योग्य उपादेय | एकदेश उपादेय | हेय | आश्रय करने योग्य परम उपादेय |
| जानने से लाभ व सिद्धि | पारिणामिक भाव के आश्रय से विकार दूर होना शुरू होता है | पुरुषार्थ से विकार नष्ट होता है | अनादि से विकार करता हुआ भी जीव जड नहीं होता है | स्वभाव से शुद्ध होने पर भी कर्म सम्बन्ध से पर्याय में विकार है | आत्म-निर्भरता आती है |
| जीवों की संख्या | संख्यात अथवा असंख्यात | अनंत (औपशमिक से अनंतगुणे) ४-१४ गुण-स्थानवर्ती+ सिद्ध भगवान | अनंत (क्षायिक से अनंतगुणे) १-१२ गुणस्थानवर्ती | अनंत (क्षायोपशमिक से विशेष अधिक) १-१४ गुण-स्थानवर्ती | समस्त जीव (औदयिक से विशेष अधिक) १-१४ गुण- स्थानवर्ती + सिद्ध भगवान |
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flowchart TB
A["कर्म"] --> B["घातिया (आत्मा के अनुजीवी गुणों को घाते) (47)"] & C["अघातिया"]
B --> B1["ज्ञानावरण (5)"] & B2["दर्शनावरण (9)"] & B3["मोहनीय (28)"] & B4["अंतराय (5)"]
B3 --> B31["दर्शन मोहनीय (3)"] & B32["चारित्र मोहनीय (25)"]
B31 --> M1["मिथ्यात्व"] & M2["सम्यग्मिथ्यात्व"] & M3["सम्यक्त्व प्रकृति"]
B32 --> K1["कषाय (16)"] & L1["नो-कषाय (9)"]
K1 --> K11["अनन्तानुबन्धी<br>क्रोध-मान-माया-लोभ (4)"] & K12["अप्रत्याख्यानावरण<br>क्रोध-मान-माया-लोभ (4)"] & K13["प्रत्याख्यानावरण<br>क्रोध-मान-माया-लोभ (4)"] & K14["संज्वलन<br>क्रोध-मान-माया-लोभ (4)"]
C --> C1["वेदनीय"] & C2["आयु"] & C3["नाम"] & C4["गोत्र"]
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style C4 fill:#FFD600Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: सूत्र में ‘यथाक्रमं’ पद अक्रम का निराकरण करने के लिए दिया है क्योंकि क्रम शब्द आनुपूर्वी का सूचक है। जो क्रम है वह यथाक्रम है जैसे औपशमिकादि भावों का निर्देश है उसी प्रकार व्दि, नव आदि का निर्देश जानना चाहिए।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
उत्तर : औपशमिक भाव के दो, क्षायिक भाव के नौ, क्षायोपशमिक भाव के अठारह, औदयिक भाव के इक्कीस और पारिणामिक भाव के तीन भेद हैं। इस प्रकार भावों के क्रम से जानना चाहिए।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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