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Acharya Shri Umaswami
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अर्थस्य।।१७।।
सूत्रार्थ – अर्थ (वस्तु के) अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा – ये चारों मतिज्ञान होते हैं।।१७।।

भावार्थ

ये बहु, बहुविध आदि पदार्थ के विशेषण हैं। अर्थात् बहु यानी बहुत से पदार्थ, बहुविध यानी बहुत तरह के पदार्थ।
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning

These – impression (avagraha), etc. – are sensory-knowledge (matijñāna) of substances (artha).
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


पदार्थ के भेद
बहु (1)
(बहुत पदार्थ)
बहुविध (2)
(बहुत प्रकार के पदार्थ)
क्षिप्र (3)
(शीघ्र)
अनिसृत (4)
(गृह)
अनुच (5)
(बिना कहा)
ध्रुव (6)
(अचल / बहुत काल स्थायी)
अल्प (7)
(अल्प पदार्थ)
एकविध (8)
(एक प्रकार के पदार्थ)
अक्षिप्र (9)
(मंद)
निसृत (10)
(प्रकट)
उक्त (11)
(बताया हुआ)
अध्रुव (12)
(चंचल / विनाशी)

Reference : Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-ChabdaLink


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान : अर्थ का ग्रहण गुण-ग्रहण की निवृत्ति के लिए है। नैयायिक कहते हैं कि रूपादि गुण ही इन्द्रियों के द्वारा गृहीत होते हैं, इसलिए रूपादि गुणों का ही ग्रहण मानना चाहिये और कोई दुसरा द्रव्य नहीं है। नैयायिक के इस मत का निराकरण करने के लिए ‘अर्थस्य’ यह कहा गया है क्योंकि अमूर्तिक रूपादि गुण का इन्द्रियों से साक्षात् ग्रहण नहीं हो सकता है।

उत्तर : जो अन्तरंग एवं बहिरंग निमित्त के कारण से उत्पत्ति के प्रति तत्पर स्वकीय पर्यायों को प्राप्त होता है वा पर्यायों के द्वारा प्राप्त किया जाता है उसे अर्थ कहते हैं और वह अर्थ ही द्रव्य है।



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 17-Dec-2025.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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