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Acharya Shri Umaswami
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मतिश्रुतावधिमनःपर्य्ययकेवलानि ज्ञानम्।।९।।
सूत्रार्थ – मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्य्ययज्ञान और केवलज्ञान – ये पाँच ज्ञान हैं।।९।।

भावार्थ

मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल ये पाँच ज्ञान हैं। इन पाँच इन्द्रियों और मन के द्वारा पदार्थों का ज्ञान होता है इसे मतिज्ञान कहते हैं। मतिज्ञान से ज्ञात हुए पदार्थों से संबंध रखने वाले किसी दुसरे पदार्थ का ज्ञान को श्रुतज्ञान कहते है। जैसे मतिज्ञान के द्वारा घट को जानकर अपनी बुद्धि से यह जनना कि यह घट पानी भरने के कम का है, अथवा उस एक घट के समान या असमान जो अन्य बहुत से घट है, उनको जान लेना श्रुतज्ञान है। इस श्रुतज्ञान के दो भेद है – अनक्षरात्मक और अक्षरात्मक। कर्ण इंद्रिय के सिवा बाकी की चार इंद्रियो के द्वारा होने वाले मतीज्ञान के पश्चात जो विशेष ज्ञान होता है वह अनक्षरात्मक श्रुतज्ञान है। जैसे स्वयं घट को जानकर यह जानना कि यह अमुक काम में आ सकता है। और कर्ण इंद्रिय के द्वारा होने वाले मतीज्ञान के पश्चात जो विशेष ज्ञान होता है वह अक्षरात्मक श्रुतज्ञान है। जैसे, ‘घट’ इस शब्द को सुनकर कर्ण इंद्रिय के द्वारा जो मतीज्ञान हुआ उसने केवल शब्द मात्र को ही ग्रहण किया’। उसके बाद उस “घट” शब्द के वाच्य घडे को देखकर यह जनना कि यह घट है और यह पानी भरने के कम का है, यह अक्षरात्मक श्रुतज्ञान है। द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादा लिए हुए रुपी पदार्थ को प्रत्यक्ष जानने वाले ज्ञान को अवधीज्ञान कहते है। मनुष्य लोक में वर्तमान जीवो के मन में स्तिथ जो रुपी पदार्थ है, जिनका उन जीवो ने सरल रूप से या जटील रूप से विचार किया है या विचार कर रहे है अथवा भविष्य मेड विचार करेंगे, उनको स्पष्ट जानने वाले ज्ञान को मनःपर्यय कहते है और सब द्रव्यो की सब पर्यायोको एक साथ जानने वाले ज्ञान को केवलज्ञान कहते है।
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Knowledge is of five kinds – sensory-knowledge –matijñāna, scriptural-knowledge – śrutajñāna, clairvoyance – avadhijñāna, telepathy1 – manaÍparyayajñāna, and omniscience – kevalajñāna.
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


मतिज्ञान
इन्द्रियों और मन के द्वारा पदार्थों का जो ज्ञान होता है, उसे मतिज्ञान कहते हैं।
श्रुतज्ञान
मतिज्ञान से ज्ञात पदार्थ का जो विशेषरूप से ज्ञान होता है, उसे श्रुतज्ञान कहते हैं।
अवधिज्ञान
द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा लिये हुए रूपी पदार्थ का इन्द्रियों की सहायता बिना जो ज्ञान होता है, उसे अवधिज्ञान कहते हैं।
मनःपर्यय ज्ञान
द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा लिये हुए एकक्षेत्रीय मनोगत रूपी पदार्थ का जो ज्ञान होता है, उसे मनःपर्ययज्ञान कहते हैं।
केवलज्ञान
सब द्रव्यों तथा उनकी सब पर्यायों को एक साथ स्पष्ट जानने वाले ज्ञान को केवलज्ञान कहते हैं।


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान : अवधिज्ञान से विशुद्धतर होने से अवधिज्ञान के बाद मनःपर्यय का निर्देश किया है क्योंकि मनःपर्ययज्ञान विशुद्धतर होने का कारण संयम है। मनःपर्यय ज्ञान संयमी जनों के ही होता हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर : ज्ञान पाँच होते हैं—
(१) मतिज्ञान (२) श्रुतज्ञान (३) अवधिज्ञान (४) मनःपर्यय ज्ञान (५) केवलज्ञान। सामान्य की अपेक्षा से ज्ञान एक ही कहा है, तथापि विशेष की अपेक्षा पर्यायार्थिक नय के आश्रय से ज्ञान पाँच को कहते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 12-Dec-2025.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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