
Acharya Shri Umaswati
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Sutra
बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च ॥३७॥
Meaning
(च) और (बन्धे) बन्ध होने पर (अधिक) अधिक गुण वाले परमाणु (पारिणामिक) कम गुण वाले परमाणुओं को अपने रूप परिणमाने वाले (भवतः ) होते हैं॥३७॥


भावार्थ
बन्ध होने पर अधिक गुण वाला परमाणु अपने से कमगुण वाले परमाणु को अपने रूप कर लेता है। जैसे गीला गुड़ अपने साथ बन्ध को प्राप्त होते हुये रज को गुड़रूप परिणमा लेता है। इससे दोनों मिलकर एक हो जाते हैं और उनके रस, रूप आदि गुणों में भी परिवर्तन होकर स्निग्ध बन जाता है। इसी से बंधने वाले परमाणुओं में दो गुण का अन्तर रखा है। इससे अधिक अन्तर होने से परमाणु दूसरे में मिल तो सकता है किन्तु फिर तीसरी अवस्था प्रगट नहीं हो सकती। क्योंकि अल्पगुण वाला अपने से अधिकगुण वाले पर कुछ भी असर नहीं डाल सकता। इसी प्रकार अन्तर न रहने से भी दोनों समान बलशाली होने से एक दूसरे को अपने रूप नहीं परिणमा कर अलग-अलग ही रह जाते हैं। Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
English Meaning:
In the process of combination, the atom with higher degree of the attribute transforms the other. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
बंध होने पर
flowchart LR B["कम गुण वाले<br/>परमाणु"] B --> C["अधिक गुण रूप<br/>परिणत हो जाते हैं"]
पुद्गल बंध से जीव बंध की तुलना
पुद्गल बंध से जीव बंध की तुलना
| पुद्गल | जीव |
|---|---|
| • स्निग्धता या रूक्षता के कारण | • राग (स्निग्ध) और द्वेष (रूक्ष) के कारण |
| • जघन्य गुण रूप परमाणु का बंध नहीं होता | • जघन्य (एक) गुण – आत्मा का एकत्व होने पर बंध नहीं • सूक्ष्म लोभ (जघन्य राग) से मोहनीय का बंध नहीं |
| • बंध होने पर अधिक गुण (शक्ति) रूप परिणाम | • लोक में भी अधिक गुणों वाले व्यक्ति के संयोग से उन्नत (गुण) रूप परिणाम होता है और • हीन गुण वाले व्यक्ति के संयोग से हीन परिणाम होता है। |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
Answer यहाँ बन्ध की चर्चा करने का प्रयोजन यह है कि आत्मा के योग व्यापार के निमित्त से आत्मा के प्रदेशों में विस्रसोपचित अनन्तानन्त प्रदेशी स्निग्ध और रूक्ष से परिणत पौद्गलिक कर्मबन्ध को प्राप्त हो जाते हैं। उस परिणामक से अपादित परिणाम से ज्ञानावरण आदि कर्म भाव से परिणत पौद्गलिक कर्म तीस कोटाकोटि सागर आदि तक की स्थिति तक घन परिणामी बन्ध को प्राप्त रहते हैं, विघटित नहीं होते ।
Reference: :Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
Answer हाँ, जिस प्रकार शुक्ल और पीत रंग के मिलने पर हरे रंग के पत्र आदि उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार दो गुण वाली और चार गुण वाली जो अवस्थाएँ थी उनका व्यय होकर तीसरी छह गुण अवस्था वाला स्कन्ध उत्पन्न हो जाता है।
Reference: :Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 13-feb-2026
Courtesy:
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