
Acharya Shri Umaswati
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औपपादिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः ।।२७।।
सूत्रार्थ– उपपाद जन्मवाले और मनुष्यों के सिवा शेष सब जीव तिर्यंच योनि वाले हैं ।।२७।।


भावार्थ
अर्थ: उपपाद जन्म वाले देव नारकी और मनुष्यों के सिवाय बाकी जो संसारी जीव हैं वे सब तिर्यंच हैं। अतः एकेन्द्रिय जीव भी तिर्यंच ही हैं। वे समस्त लोक में पाए जाते हैं। इसी से तिर्यंचों का कोई अलग लोक नहीं बताया है ।।२७।।
Reference: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
English Meaning:
Except those born in special beds – aupapādika – and humans, all other beings have subhuman seat-of-birth – tiryańcayoni.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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कौन तिर्यंच किस स्वर्ग में उत्पन्न होता है
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A["कौन तिर्यंच किस स्वर्ग में<br>उत्पन्न होता है"] --> B["असैनी पंचेन्द्रिय<br>पर्याप्त"] & C["सैनी<br>पर्याप्त"]
B --> D["भवनवासी<br>व्यंतर"]
C --> F["भोगभूमि"] & G["कर्मभूमि"]
F --> H["मिथ्यादृष्टि<br>सासादन"] & I["सम्यग्दृष्टि"]
H --> J["भवनत्रिक"]
I --> K["सौधर्म / ऐशान<br>स्वर्ग (1 व 2)"]
G --> L["मिथ्यादृष्टि<br>सासादन"] & M["सम्यग्दृष्टि<br>देशसंयमी"]
L --> N["भवनत्रिक से सहस्रार (12)<br>स्वर्ग तक"]
M --> O["सौधर्म से अच्युत स्वर्ग तक<br>(1–16)"]
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style O fill:#FFCDD2कौन मनुष्य किस स्वर्ग में उत्पन्न होता है?
| मनुष्य | उत्पत्ति स्वर्ग |
| 1) भोगभूमिया – मिथ्यादृष्टि व सासादन गुणस्थानवर्ती | भवनत्रिक |
| सम्यग्दृष्टि | सौधर्म–ऐशान स्वर्ग (1 व 2) |
| 2) कुंभोगभूमिया – मिथ्यादृष्टि व सासादन गुणस्थानवर्ती | भवनत्रिक |
| सम्यग्दृष्टि | सौधर्म–ऐशान स्वर्ग (1 व 2) |
| 3) कर्मभूमिया – मिथ्यादृष्टि व सासादन गुणस्थानवर्ती | भवनवासी से अच्युत स्वर्ग (16) तक |
| सम्यग्दृष्टि व देशसंयमी | सौधर्म से अच्युत स्वर्ग (1–16) |
| द्रव्य जिनलिंगी | ग्रैवेयक तक |
| परिव्राजक तपस्वी | ब्रह्म स्वर्ग तक (5 तक) |
| आजीवक, कांजी आहारी, अन्य लिंगी | सहस्रार स्वर्ग तक (12 तक) |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: तिरोभाव होने से ‘तिर्यग्’ कहलाते हैं। तिरोभाव, न्यग्भाव, उपबाह्य सब एकार्थवाची हैं। अतः कर्मोदय से अपादित भाव अर्थात् कर्मोदय से जिनमें तिरोभाव हैं, वे तिर्यग्योनि हैं। तिर्यंच योनि जिनके है वे तिर्यग्योनि कहलाते हैं। योनि का अर्थ जन्म है। तिर्यंचों में जन्म लेने वाले तिर्यग्योनिज कहलाते हैं। इनके त्रस-स्थावर आदि भेद पहले बताये जा चुके हैं। न्यग्भूता अर्थात् छिपी हुई जिनकी योनि है वह तिर्यग्योनि जीव है। अथवा उपबाह्या अर्थात् तिरस्कृत योनि (जिसमें तिरस्कार होता है) तिर्यग्योनि है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
उत्तर: ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि जिनके अन्तरंग में तिर्यंच गति नाम कर्म का उदय होते हुए जो तिरस्कार को प्राप्त होने वाले हैं वे ही तिर्यंच हैं, ऐसा कथन होने से तिरस्कृत होते हुए भी मनुष्य-तिर्यंच नहीं कहलायेंगे।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 22 February 2026.
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
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