
Acharya Shri Umaswati
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सारस्वतादित्यवह्न्यरुणगर्दतोयतुषिताव्याबाधारिष्टाश्च ॥२५॥
सूत्रार्थ– सारस्वत, आदित्य, वह्नि, अरुण, गर्दतोय, तुषित, अव्याबाध और अरिष्ट – ये लोकान्तिक देव हैं ॥२५॥


भावार्थ
अर्थ: सारस्वत, आदित्य, वह्नि, अरुण, गर्दतोय, तुषित, अव्याबाद और अरिष्ट ये आठ प्रकार के लोकान्तिक देव हैं, जो ब्रह्मलोक स्वर्ग की पूर्वात्तर आदि आठ दिशाओं में क्रम से रहते हैं। ये सभी स्वतन्त्र हैं, किसी इन्द्र के अधीन नहीं हैं। सब समान हैं। इनमें कोई छोटा और कोई बड़ा नहीं है। विषयों से विरक्त हैं इसी से इन्हें देवर्षी कहते है। अन्य देव इनकी बड़ी प्रतिष्ठा करते हैं। ये चौदह पूर्व के पाठी होते हैं और जब तीर्थंकरों का वैराग्य होता है तब उस समय उन्हें प्रतिबोधन करने के उद्देश्य से उनके पास जाते हैं ॥२५॥
Reference: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
English Meaning:
The ‘laukāntika’ deva are (the groups of) Sārasvata, Āditya, Vahni, Aruna, Gardatoya, Tusita, Avyābādha and Arista.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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लोकांतिक देव
| निवास | पाँचवें ब्रह्म स्वर्ग में; 8 दिशाओं में |
| नाम की सार्थकता | लोक = अन्त = ब्रह्म स्वर्ग के अन्त (में निवास जिनका) लोक (संसार) + अन्त = संसार का अन्त निकट जिनका |
| भेद | 1. सारस्वत 2. आदित्य 3. वह्नि 4. अरुण 5. गर्दतोय 6. तुषित 7. अव्याबाद 8. अरिष्ट 8 + (16 अन्य) = 24 भेद |
| कुल संख्या | 4,07,820 |
| विशेषता | 1. स्वतन्त्र 2. परस्पर हीनाधिकता से रहित 3. ब्रह्मचारी 4. चौदह पूर्व के पाठक 5. सम्यग्दृष्टी 6. संसार से विरक्त 7. देवर्षी 8. तीर्थंकर के तप कल्याणक में आते हैं |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: लोकान्तिक देव चौबीस प्रकार के होते हैं – (१) सारस्वत (२) अग्र्यास (३) सूर्याभ (४) आदित्य (५) चन्द्राभ (६) सत्याभ (७) वह्नि (८) श्रेयस्कर (९) क्षेमंकर (१०) अरुण (११) वृषभेष्ट (१२) कामचर (१३) गर्दतीय (१४) निर्माण रजस (१५) दिगन्तरक्षित (१६) तुषित (१७) आत्मरक्षित (१८) सर्वरक्षित (१९) अव्याबाद (२०) मरुत (२१) वसु (२२) अरिष्ट (२३) अश्व (२४) विश्व।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
उत्तर: पूर्व, उत्तर आदि आठों दिशाओं में यथाक्रम सारस्वतादि देवों का निवास है — ऐसा जानना चाहिए। उनमें पूर्व-उत्तर कोण (ईशान) में सारस्वत विमान है। पूर्व दिशा में आदित्य विमान, पूर्व और दक्षिण दिशा के मध्य में वह्नि विमान, दक्षिण दिशा में अरुण विमान, दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य में गर्दतोय विमान, पश्चिम दिशा में तुषित विमान, उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य में अव्याबाद विमान और उत्तर दिशा में अरिष्ट विमान है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 22 February 2026.
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
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