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Acharya Shri Umaswati
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कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च ॥१७॥
सूत्रार्थ– वे दो प्रकार के हैं – कल्पोपपन्न और कल्पातीत ॥१७॥


भावार्थ

अर्थ: वैमानिक देवों के दो भेद हैं – कल्पोपपन्न और कल्पातीत। जहाँ इन्द्र आदि की कल्पना होती है उन सोलह स्वर्गों को कल्प कहते हैं और जहाँ इन्द्र आदि की कल्पना नहीं होती उन्हें ग्रैवेयक वगैरह को कल्पातीत कहते हैं ॥१७॥
Reference: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The heavenly deva (vaimānika) have two divisions, ‘kalpopapanna’ and ‘kalpātīta’.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: इन्द्र आदि दस प्रकार के कल्पनायें जिनमें पाई जायें, वे कल्पोपपन्न देव हैं। सौधर्म से अच्युत स्वर्ग पर्यन्त स्वर्गों में रहने वाले वैमानिक देव कल्पवासी कहलाते हैं। मिथ्यात्व से मलिन बालवतप करने वाले तापसियों के अतिरिक्त अकामनिर्जरा से युक्त बंधनबद्ध तीर्यंच भी ऐसे देव होते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: वे देव ‘मैं ही इन्द्र हूँ’ ऐसा मानने वाले हैं और असूया, परनिन्दा, आत्मश्लाघा (आत्म-प्रशंसा), मत्सर से दूर रहते हुए केवल सुखमय जीवन बिताते हैं। वे महाद्युतिमान, समच तुरस्र संस्थान, विक्रीय ऋद्धिधारी, अवधीज्ञानी, निष्प्रविचारी एवं शुभ लेश्याओं वाले होते हैं। वे हंस के समान श्वेत शरीर को धारण करते हैं, एक हाथ ऊँचे होते हैं। वे केवल सुखमय होकर हर्ष-युक्त होते हुए निरन्तर क्रीड़ा करते रहते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 22 February 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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